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प्रोफेसर हो या फिर Ph.D. 70 प्रतिशत साधु संत Ph.D और IIT-IIM डिग्री धारक

करते है मंदिरों में पूजा और देते है कॉलेजों में लेक्चर
इन साधु संतों में वकील, डॉक्टर्स   प्रोफेसर, संस्कृत विद्वान और आचार्य भी शामिल
प्रयाग का निरंजनी अखाड़ा है साधुओं की शिक्षा मंदिर.
प्रयाग राज के महा कुम्भ के बारे में कौन नही जानता हर साल जब यह आयोजित होता है तो देश विदेश से लोगों की भीड़ और दूर दूर से आये साधु संतों की एक मनोरम छटा बिखेर देता है। जिसका दृश्य देखते ही बनता है। और इसकी डुबकी में स्नान कर लोगों का मन पवन हो जाता है। लेकिन क्या आप जानते है जो साधु संत हमारे बीच आते है। इनके पास दिव्य ज्ञान और अध्यात्म ज्ञान के साथ ही यह मास्टर, वकालत, डॉक्टर और प्रोफेसर का गायन भी रखते है और 70 प्रतिशत तक साधु संत Ph.D और IIT-IIM डिग्री धारक है। यह एक तरफ जहां भगवान की आरती में लीन रहते तो वही दूसरी और कॉलेजों में लेक्चर देकर आने वाली पीढ़ी को ज्ञान बाटते है।
प्रयाग कुम्भ में जहां एक तरफ लोगों के आकर्षक का केंद्र साधु संत होते है तो वही दूसरा आकर्षक का केंद्र निरंजनी अखाड़ा है । जिसमें लगभग 70 प्रतिशत साधु-संतों ने पढ़ाई करके उच्च शिक्षा प्राप्त कर डॉक्टर्स, लॉ एक्सपर्ट, प्रोफेसर, संस्कृत के विद्वान और आचार्य की उपाधि हासिल की।  इस अखाड़े के महेशानंद गिरी ज्योग्राफी के प्रोफेसर हैं और दूसरे साधु बालकानंद जी डॉक्टर और पूर्णानंद लॉ एक्सपर्ट और संस्कृत के विद्वान हैं  संत स्वामी आनंदगिरी नेट क्वालिफाइड हैं और आईआईटी खड़गपुर, आईआईएम शिलॉन्ग में लेक्चर भी दे चुके हैं। वो  इस वक़्त बनारस से पीएचडी कर रहे हैं और संत आशुतोष पुरी नेट क्वालिफाइड होकर पीएचडी कर रहे हैं।
इस अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी का कहना है कि निरंजनी अखाड़ा इलाहाबाद-हरिद्वार में पांच स्कूल-कॉलेज और बनवा रहा है। हरिद्वार में एक संस्कृत कॉलेज भी है जिसका मैनेजमेंट भी संत ही संभालते हैं। अखाड़े में 150 में से 100 से ज्यादा महामंडलेश्वर और 1500 में से 1100 संत-महंत उच्च शिक्षा हासिल कर चुके है।
बहुत ज्यादा फेमस है निरंजनी अखाड़ा
अखाड़े का इतिहास
इस अखाड़े के इतिहास को लेकर कई पुस्तकें लिखी गयी लेकिन यह हम आपको दो पुस्तको के बारे में वट रहे है जिसमे से एक सिद्धार्थ शंकर गौतम की किताब सनातन संस्कृति का महापर्व सिंहस्थ है इन्होंने लिखा है कि “निरंजनी अखाड़े की स्थापना साल 904 में गुजरात के मांडवी में हुई थी लेकिन इतिहासकार जदुनाथ सरकार इसे साल 1904 बताते हैं. प्रमाणों के मुताबिक स्थापना विक्रम संवत 960 में हुई थी।सभी अखाड़ों में निरंदनी अखाड़ा सबसे फेमस है और इसमें सबसे ज्यादा क्वालिफाइड साधु-संत हैं, जो शैव परंपरा को मानने वाले हैं और जटा भी रखते हैं। इस अखाड़े के इष्टदेव कार्तिकेय हैं जो देव के सेनापति हैं।
इसका इतिहास डूंगरपुर रियासत के राजगुरु मोहनानंद के समय से मिलता आ रहा है।” तो वही दूसरी किताब  शालिग्राम श्रीवास्तव की फेमस किताब प्रयाग प्रदीप है इन्होंने लिखा है कि “इनका स्थान दारागंज है।  हरिद्वार, काशी, त्र्यंबक, ओंकार, उज्जैन, उदयपुर और बगलामुखी जैसी जगहों पर इनके भव्य आश्रम बने हैं। महंत अजि गिरि, मौनमौनी सरजूनाथ गिरि, पुरुषोत्तम गिरि, हरिशंकर गिरि, रणछोर भारती, जगजीवन भारती, अर्जुन भारती, जगन्नाथ पुरी, स्वभाव पुरी, कैलाश पुरी, खड्ग नारायण पुरी, स्वभाव पुरी ने मिलकर इस अखाड़े की नींव रखी थी।”
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