धार्मिक

कुंभ के बाद कहाँ गुम हो जाते है नागा साधु, जाने रहस्य

विशाल कुंभ की कहानी हर कोई जानता है और हर किसी का सपना एक बार कुम्भ मेले में गंगा में डुबकी लगाने का होता है। वहीं हर श्रद्धालुओं के साथ हो बड़ी संख्या में गंगा में डुबकी लगाने जाते है। लेकिन क्या अपने कभी सोचा है कि हजारों के संख्या में यह आये नागा साधु आखिर कहां गुम हो जाते है, कहाँ इनका ठिकाना होता है, और क्या खाते पीते है। तो चलिए आपको बताते है नागा साधु से जुड़े इस अद्भुत रहस्य के बारे में…
जब भी कोई व्यक्ति नागा साधु बनने की सोचता है तो उससे अखाड़े में शिक्षा के लिए जाना होता लेकिन उससे पहले उसके पूरे बैकग्राउंड के बारे पता किया जाता है। उसके बाद ही उसकी असली परीक्षा शुरू होती है। अखाड़े में एंट्री के बाद साधुओं को तप, ब्रह्मचर्य, वैराग्य, ध्यान, संन्यास और धर्म की शिक्षा दी जाती है। इस पूरी शिक्षा में 12 साल लगते है। 12 के बाद फिर उसे अगली प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

नागा साधु बनने की इस दूसरी प्रक्रिया में नागा साधु अपना मुंडन और पिंडदान करते हैं, इसके बाद उनकी जिंदगी अखाड़ों और समाज के लिए समर्पित हो जाती है। फिर उसका सांसारिक जीवन समाप्त हो जाता है।  उनका अपने परिवार और रिश्तेदारों से कोई संबंध नहीं रहता। दरअसल पिंडदान में वो खुद को अपने परिवार और समाज के लिए मरा हुआ मान लेते है और अपने ही हाथों से वो अपना श्राद्ध कर लेते है। इन सब के बाद अखाड़े के गुरु उस व्यक्ति को नया नाम और नई पहचान देते हैं। जिससे वो जाना जाता है।
नागा साधु बनने के बाद वो अपने शरीर पर भभूत की चादर चढ़ा देते हैं। इसमें वो मुर्दे की राख को शुद्ध कर शरीर पर मलते है। हालांकि नागा साधु का कोई घर या निवास स्थान नहीं होता लेकिन ज्यादातर नागा साधु हिमालय, काशी, गुजरात और उत्तराखंड में के पहाड़ी इलाकों में रहते हैं। नागा साधु गुफाओं में साधना करते हैं लेकिन वो एक ही गुफा में हमेशा के लिए नहीं रहते हैं, बल्कि वो अपनी जगह बदलते रहते हैं।यहां तक कई नागा साधु जंगलों में ही घूमते-घूमते कई साल गुजार देते है और वो सिर्फ  कुंभ या अर्धकुंभ में ही नजर आते हैं।

नागा साधु 24 घंटे में सिर्फ एक बार भोजन करते हैं। वो खाना भिक्षा मांगकर खाते हैं। इसके लिए उन्हें सात घरों से भिक्षा लेने का अधिकार होता है। लेकिन अगर उन्हें सातों घरों से कुछ न मिले, तो उन्हें भूखा ही रहना पड़ता है।

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