बॉलीवुड

सैंडविच बेच यह शख्स बन गया बॉलीवुड का ट्रेजडी किंग

बॉलीवुड में अपना नाम कमाना आसान काम नहीं है। इसके लिए लोगों को काफी पापड़ बेलने पड़ते है लेकिन बॉलीवुड के ट्रेजडी कहे जाने वाले दिलीप कुमार ने पापड़ बेलने के साथ ही साथ सैंडविच भी बेचा है। एक्टिंग में आने से पहले वह आर्मी कैंटीने के बाहर सैंडविच बेचकर अपना गुजारा किया करते थे। लेकिन किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था और सैंडविच बेचना छोड़ वह बॉलीवुड के ट्रेजडी किंग बन गए।


दिलीप कुमार ने 1944 में आई फिल्म  ज्वार भाटा से बॉलीवुड में डेब्यू किया। लेकिन जनता के बीच कुछ खास पहचान नहीं बना पाएं। फिर 1949 में फिल्म अंदाज की सफलता ने उन्हें लोगों के दिलो में बैठा दिया।  उन्हें भारतीय फिल्मों के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। बॉलीवुड में ‘ट्रेजडी किंग’ के नाम से मशहूर दिलीप कुमार को सदी के सबसे बड़े एक्टर के रूप में जाना जाता है।

महानायक अमिताभ बच्चन बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान, समेत कई सारे ऐसे सेलेब्स हैं जो दिलीप साहब को किसी यूनिवर्सिटी से कम नहीं समझते। उन्होंने पांच दशकों तक अपने शानदार अभिनय से दर्शकों के दिल पर अपनी हुकुमत की। उन पर फिल्माया गया ‘गंगा जमुना’ का गाना नैना जब लड़िहें लोगों के बीच आज भी काफी पॉपुलर है।

दिलीप कुमार को भारतीय फिल्मों के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।  इसके अलावा उन्हें पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज से भी सम्मानित किया गया है। अभिनय के क्षेत्र में पाकिस्तान से इतना बड़ा सम्मान किसी को नहीं दिया गया। दिलीप कुमार का असली नाम मुहम्मद यूसुफ खान है। उनका जन्म पेशावर में 11 दिसंबर, 1922 को हुआ था।


पेशावर के साथ-साथ दिलीप कुमार के पिता के महाराष्ट्र के देवलाली में भी फलों के बागीचे थे। दिलीप ने नासिक के पास एक स्कूल में पढ़ाई की। वर्ष 1930 में उनका परिवार मुंबई आकर बस गया। वर्ष 1940 में दिलीप कुमार की पिता से किसी बात को लेकर मनमुटाव हो गया। मतभेद के कारण वह पुणे आ गए. यहां उनकी मुलाकात एक कैंटीन के मालिक ताज मोहम्मद से हुई, जिनकी मदद से उन्होंने आर्मी क्लब में सैंडविच स्टॉल लगाया। इसके बाद वह मुंबई वापस लौट आए और इसके बाद उन्होंने पिता को मदद पहुंचने के लिए काम तलाशना शुरू किया।

वर्ष 1943 में चर्चगेट में इनकी मुलाकात डॉ. मसानी से हुई, जिन्होंने उन्हें बॉम्बे टॉकीज में काम करने की पेशकश की, इसके बाद उनकी मुलाकात बॉम्बे टॉकीज की मालकिन देविका रानी से हुई। दिलीप की पहली मूवी थी फिल्म ‘ज्वार भाटा’ थी. जो 1944 में आई. 1949 में फिल्म ‘अंदाज’ की सफलता ने उन्हें लोकप्रिय बनाया। ‘दीदार’ (1951) और ‘देवदास’ (1955) जैसी फिल्मों में दुखद भूमिकाओं के मशहूर होने की वजह से उन्हें ट्रेजडी किंग कहा गया।

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