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अंतिम संस्कार महंगा होने के कारण 12 साल से परिवार के साथ रह रहा है यह मुर्दा

2 साल से कर रहा अंतिम संस्कार की तैयारी, अभी तक नहीं हुआ अंतिम संस्कार.

हमारे परिवार में जब कोई मर जाता है तो सब लोग उसके अंतिम संस्कार का इंतजाम करते है, और श्मशान घाट में जलाकर या फिर कब्र में दफनाकर मुर्दे की आत्मा को शांति  देते है यही बरसो से चला आ रहा है। गलती से भी अंतिम संस्कार में कुछ घंटो की भी देरी हो जाएं तो इसे बुरा माना जाता है। लेकिन इंडोनेशिया के एक परिवार में बरसे से अजीब रिवाज चला आ रहा है। यह परिवार मुर्दे को दफनाता नहीं है बल्कि अपने साथ रखता है। बिल्कुल जिंदा इंसान की तरह । आपको यकीन नहीं आ रहा होगा लेकिन यह सच है। आइए आपको आगे बताते है क्या है मामला

इंडोनेशिया के दक्षिणी सुलावेसी द्वीप पर रहने वाली तोराजा कम्युनिटी में मुर्दो को साथ रखने के रिवाज बरसो से चला आ रहा है। यही वजह है कि यहां एक परिवार ने 12 साल से एक मुर्दे के साथ जिन्दगी काट रहा है।  दरअसल इस समुदाय के लोग मरे हुए लोगों को भी जिंदा इंसान की तरह रखते हैं।  इस परिवार के सदस्य मृत इंसान के लिए रोजाना  खाना-पानी, कपड़े, साफ-सफाई, यहां तक कि सिगरेट का भी इंतजाम करते है और आपसी बातचीत में भी उसे शामिल करते है जैसे वे जिंदा हों और बस बीमार हों। ऐसा ही एक परिवार 12 साल से एक मृतक के अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहा है।

इस परिवार में मुर्दे को साथ रखना कोई जबरदस्ती नहीं है। यह अंतिम संस्कार भी करते है लेकिन इन लोगों में अंतिम संस्कार बहुत खर्चीला होता है। इसके लिए इन्हे कई पशुओं की बलि देकर पूरे समाज को खिलाना-पिलाना होता है। इस तरह से अंतिम संस्कार किसी शादी समारोह की तरह कई दिनों तक चलता रहता है। जो कि इंडोनिशया में सालाना मिलने वाली एवरेज सैलरी से भी कई गुना ज्यादा का खर्च है।  इस वजह से जब तक अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं जुट जाते, परिवार मृत सदस्य को अपने साथ ही रखता है।  इसके लिए मुर्दे को फार्मेलिन के इंजेक्शन लगाएं जाते है जिससे वह सड़े नहीं। उसे ताबूत में लिटाकर घर के अन्दर ही रखा जाता है और उसके लिए बाकायदा खाना, नाश्ता, पानी  का इंतजाम होता है। रोज उसके कपड़े बदले जाते हैं, और रात को ढीले कपड़े पहनाए जाते हैं।

इस कम्युनिटी में मृतक को दफना दिए जाने के बाद साल में एक बार कब्र से निकालकर बाकायदा नहलाया-धुलाया जाता है और बाल संवारकर नए कपड़े पहनाए जाते हैं। इस रिवाज को माएने कहा जाता है, जिसका मतलब होता है, शवों को साफ करने का समारोह। इस दिन शवों को कब्रों से निकालकर वहां ले जाया जाता है, जहां उसकी मौत हुई थी, फिर उसे गांव लाया जाता है। गांव तक लाने के दौरान सीधी रेखा में चला जाता है। इस दौरान मुडऩा या घूमना वर्जित होता है।

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