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हर रोल में जान फूंकने वाले अरशद वारसी करते थे सेल्समैन की नौकरी

हमारे सामने ऐसे कई उदाहरण है कि जिनका लक्ष्य मंज़िल पाना होता है, और जो कामयाब होना चाहते है। उनके  लिए कुछ भी छोटा या बड़ा नहीं होता है, ऐसी ही सोच रखते है। मुन्ना भाई के सर्किट। अपने अभिनय से उन्होंने सर्किट को घर घर तक पहुंचा दिया। उनके लिए कोई भी किरदार छोटा या बड़ा नहीं होता है। अपने हर किरदार में वो जान फूक देते है और वो किरदार फिल्मी पर्दे जी उठता है। वह जल्द ही एक और कॉमेडी फिल्म पागलपंती में नजर आने वाले हैं। तो चलिए आपको बताते है कैसा रहा इनका सेल्समैन की नौकरी से बॉलीवुड तक का सफर अरशद वारसी अपने सफर के बारे में बताते है कि “अच्छा लगता है। अपने बच्चों को गूगल पर मेरे बारे में खोजबीन करते देखना अच्छा लगता है। उनको ये पता होना ही चाहिए ता ने कहां से शुरू किया और आज कहां पहुंच गए। मैंने जीवन में कभी किसी काम को छोटा नहीं समझा और जो मिलता गया वह करता गया। हमें किसी भी काम को छोटे या बड़े की नजर से नहीं देखना चाहिए। मैं युवाओं को भी यही समझाता हूं कि काम करो, उसका लेवल मत देखो।”

अरशद वारसी कैसे हर किरदार में जान फूक देते है। इस बारे में उनका कहना है कि “अभिनेता के लिए जरूरी होता है कि वह हर एक किरदार को अपना ले और उस किरदार में पानी की तरह बह जाए। ये वही लोग कर सकते हैं जिन्हें किरदार की चमड़ी ओढ़ना आता है। सभी लेखक कुछ अलग सोच के साथ किरदार लिखते हैं। मैं हमेशा लेखक निर्देशक से किरदार के बारे में पूछता हूं। वह जैसा बताते हैं मैं उसे वैसा ही उतारने की कोशिश करता हूं। एक अभिनेता के तौर पर अभिनेता को वही करना चाहिए जो जो लेखक और निर्देशक ने सोचा है वह नहीं जो अभिनेता करना चाहता है।”

मुन्नाभाई सीरीज की अगली फिल्म पर उन्होंने बताया कि

“मैं भी अक्सर निर्देशक राज कुमार हीरानी से यही पूछता रहता हूं। उनका जवाब होता है कि वह लिख रहे हैं। मेरी जानकारी के मुताबिक वह मुन्नाभाई सीरीज की अगली सीक्वेल की दो तीन पटकथाएं लिख चुके हैं, बस क्लाइमेक्स और कहानी के अंत को लेकर अटके हैं। किसी दिन भी दिन राजू का फोन आ सकता है कि मिल गया मुझे कहानी का अंत, चलो अब शुरू करते हैं फिल्म।”

अभिनेता के तौर पर आप किस तरह की कहानी की खोज में रहते हैं? इस सवाल पर उन्होंने बताया कि “मुझे ऐसी कहानी पसंद आती है जो सुनते ही आपके दिल को छू जाए। अब चाहे वह कॉमेडी, एक्शन या फिर ड्रामा हो, फर्क नहीं पड़ता। बस कहानी आपके किसी एक जज्बात को छू ले।”

पागलपंती के लिए अरशद वारसी ने लंबा इन्तिज़ार किया उन्होंने बताया कि “लंबे समय बाद मुझे ऐसी फिल्म मिली है जहां मुझे खुलकर कॉमेडी करने का मौका मिला है। हर निर्देशक का अपना काम करवाने का तरीका होता है। कुछ निर्देशिक स्क्रिप्ट से हटकर कुछ भी करने की गुंजाइश नहीं छोड़ते हैं लेकिन पागलपंती के निर्देशक अनीस बज्मी ने मुझे बांधकर नहीं रखा। मुन्नाभाई में मुझे ऐसा मौका मिला था जहां राजू हिरानी ने मुझे खुलकर कॉमेडी करने की छूट दी थी।”

अरशद वारसी रटे रटाये डायलॉग पसंद नहीं करते है। उनका कहना है कि “मैं तो हमेशा दूसरे कलाकारों को यही सलाह देता हूं कि सेट पर कभी संवाद याद करके आए हीं नहीं। मैं सेट पर ही आता हूं और वहीं पढ़ता हूं और फिर बोल देता हूं। जब आप रटकर नहीं आते हैं तो कुछ नया करने की जगह होती है अगर रटकर आते हो तो थोड़ा मुश्किल होता है।”

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