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26 नवम्बर के दिन मनाया जाता है संविधान दिवस, जानें संविधान के मायने

26 जनवरी को हम गणतन्त्र दिवस मनाते है। इस दिन हमारा संविधान लागू किया गया था। लेकिन क्या आप जानते है कि संविधान दिवस कब और क्यों मनाया जाता है। हमारा संविधान कब पूरा हुआ। तो चलिए आपको बताते है कि कब पूरा हुआ हमारा संविधान

26 नवंबर 1949 को हमारे संविधानसभा ने भारत के संविधान को पूरा किया। इसलिए आज का दिन संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता हैं।  अमेरिकी प्रोफेसर गिन्सबर्ग, एल्किन्स और मेल्टन ने विश्वव्यापी संविधानों के सर्वेक्षण में पाया कि एक संविधान की औसतन उम्र केवल 19 साल होती है। उनकी रिसर्च ने यह भी पाया की उम्रदार संविधान संवैधानिक मूल्यों (जैसे कि लोकतंत्र और मौलिकाधिकार) की सुरक्षा नए संविधानों के मुकाबले बेहतर करते हैं।

संविधानों के विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि संवैधानिक स्थिरता का सीधा सम्बन्ध सामाजिक स्थिरता से है- संवैधानिक क्रांति अक्सर राजनीतिक उथल-पुथल और व्यापक सामाजिक हिंसा प्रोत्साहित करती है। इस संदर्भ में भारतीय संविधान का बुज़ुर्गपन एक अपवाद है। संविधान तो सिर्फ कागज़ के पन्नों पर लिखे कुछ शब्द है जिसके आगे  दबंग राजनेता, बंदूकों और टैकों वाली मिलिट्री, रईस उद्योगपति और अग्रिम सामाजिक वर्ग  एक किताब के सामने घुटने टेकते नजर आते है।  एक किताब का इतना डर है। कुछ लोग खासकर दलितों, की संवैधानिक आस्था का ताल्लुक बाबा साहेब अम्बेडकर की भूमिका से हो सकता है। लेकिन सबके यह बात लागू नहीं होती है।

संविधानवाद का एक बुनियादी उसूल है हिंसा पर राजनीति की प्राथमिकता हो।  एक सफल संविधान की कोशिश यही होती है कि वह हर वर्ग को यह तसल्ली दे कि उसके पनपने की संभावना हिंसक रास्तों के मुकाबले संवैधानिक राजनीति में ज्यादा है।  सामाजिक वर्गों को यह तसल्ली तभी मिल सकती है जब संवैधानिक मापदंड आपसी समझौतों पर आधारित हों। भारतीय संविधान की सफलता का मूल कारण है कि हमारी संविधानसभा में भारतीय समाज के हर छोटे-बड़े वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गयी थी।

संविधान के दायरे लगभग तीन साल लम्बी बहस और सैंकड़ों छोटे-बड़े समझौतों के ज़रिये, न कि किसी निरंकुश नेता या वर्ग-विशेष की पसंद के मुताबिक, तय हुए. कांग्रेस पार्टी के पास बहुमत था, फिर भी उसने कई विपक्षी नेताओं को संविधानसभा में आमंत्रित किया। खुद बाबा अम्बेडकर दशकों से पंडित नेहरू के राजनीतिक विरोधी थें, फिर भी वे संविधानसभा की आलेखन समिति के अध्यक्ष नियुक्त हुए। देश बंटवारे के बाद हुई हिंसा का परिणाम देख चुका था। उस पीढ़ी ने यह समझ लिया था कि भारत जैसे विविधता वाले देश में हिंसा का एकमात्र विकल्प समझौते-वाली लोकतान्त्रिक राजनीति ही हो सकती है।

सब की बात सुनी गयी।  किसी को भी सब कुछ मनचाहा नहीं मिला- खुद प्रधानमंत्री नेहरू के कई मत संविधान में प्रतिबिंबित नहीं हुए। डॉक्टर अम्बेडकर को भी अपनी कई मांगों पर समझौता करना पड़ा। पर संविधानसभा ने किसी को भी खाली हाथ नहीं भेजा। हर किसी को एक तसल्ली दी गयी- आज नहीं तो कल, यहां नहीं तो वहां, इस व्यवस्था में आप भी सत्तारूढ़ हो सकते हो। आज का हारा कल जीत भी सकता है.। हमेशा के लिए सत्ता न तो इनकी होगी न आपकी। किसी एक समय में भी, सत्ता की सारी शक्ति एक इंसान या संस्था में नहीं, बल्कि कई विभिन्न केंद्रीय और राज्य-स्तर की संस्थाओं में बांट दी गयी, ताकि कोई किसी और पर हावी न हो सके।

कुछ कमज़ोर या अल्पसंख्यक वर्ग- जैसे दलित, जनजातियां, कश्मीरी, पूर्वोत्तर राज्य आदि- जिनको आनेवाली बहुमत वाली राजनीति से कुछ वाजिब बेचैनी हो रही थी- उनको संविधान के अंतर्गत लाने के लिए कुछ ख़ास वायदे दिए गए। स्वायत्त संवैधानिक संस्थाएं (उधारणतः सुप्रीम कोर्ट, ऑडिटर जनरल, इलेक्शन कमीशन आदि) स्थापित की गयीं ताकि वे संविधानवाद की चौकीदारी कर सकें। इतनी विविध संविधानसभा में भी भारत के संवैधनिक दस्तावेज़ पर सिर्फ एक सदस्य ने हस्ताक्षर करने से इंकार किया। बाकी सभी सदस्य- चाहे वे उदारवादी रहे हों या गांधीवादी, दक्षिणपंथी थे या समाजवादी, हिन्दू थे या मुसलमान, मर्द भी और औरत भी- सभी ने इस संविधान पर हस्ताक्षर कर इसके आधार पर एक नए मुल्क की रचना करने का संकल्प लिया।

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